इस कमरे में एक रहता है सपना,
है यहां आज अर्ध-शताब्दियों से।
खोजा है उसे घनघोर कुहेलिका में,
मायावी अस्तित्व की प्रतीक्षा जारी है।
सपने होते हैं ऐसे ही बडे़ नाछोड़,
मिलतें हैं न बिछुड़तें हैं वो कभी।
मृग-मरीचिका ही लगतें हों फिर भी,
होने में साकार उनके, दौड़ जारी है।
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