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Showing posts from August, 2020

सीख

------ आहिस्ता आहिस्ता चलती रही घड़ी, घन्टे के कांटे में आंखें रुकी रुकी। होश में न थे हम जाने कब और कैसे, चहल कदमी से श्याम ढल चुकी । निकल चुका था जनाजा मौकों का बेआब्रू हो गयीं नाकामियां, रोने से भी मोहताज हो गये हम तब, हंसने लगीं  सारी बर्बादियां। अब गुब्बारे सारे छूट गये आसमां पर, देखा अरमानों का उड़जाना। नजर उतार रख हांथ दिलपर अपने, बन्द आंखें पड़ रहा पछताना। ऐ किस्मत के रचनाकारों सुनलो आज, किस्मत जीती बाजी की चाल नहीं; सहनी पड़ती है बहुत  निरंतर, जूझो,मौका खोकर पछताओ नहीं।