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Showing posts from October, 2018

जीना

जीना है अगर तो मेरी ही तरह जीओ, छोड़ उम्मीदों को  असलियत पे आओ। जीया ज़िन्दगी हमने कभी उम्मीदें सम्हाल, मर मर के हर दिन रहें हमे हरदम बदहाल। जी रहा हूं बेपरवाह आज मजबूर ही होकर, मस्त लगती है ज़िन्दगी कुछ ऐसे ही जीकर।