कहर सा मचा है मन में, धूमिल सा कुछ उतर रहा; घोर विपत्ती का है संकेत, चक्रवात है कहीं उठ रहा। निशब्द सा है माहौल सारा, अस्थिरता है इस शांति में; अस्फुट एक चीख रह गई, घुटन हो रही मनपवन में। कहीं लुट रहा है अधिकार, बिखर रही कहीं नैतिकता; सभ्यता विहीन समाज में कंगाल रह गई मानवता। किस ज़माने में जी रहें हम, कहा खो गई चरित्र-शक्ती? रेंग रहें हम फर्श पर बेजुबां, विलुप्त हो गई रीढ़ की हड्डी।