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Showing posts from November, 2019

रीढ़ की हड्डी

कहर सा मचा है मन में, धूमिल सा कुछ उतर रहा; घोर विपत्ती का है संकेत, चक्रवात है कहीं उठ रहा। निशब्द सा है माहौल सारा, अस्थिरता है इस शांति में; अस्फुट एक चीख रह गई, घुटन हो रही मनपवन में। कहीं लुट रहा है अधिकार, बिखर रही कहीं नैतिकता; सभ्यता विहीन समाज में कंगाल रह गई मानवता। किस ज़माने में जी रहें हम, कहा खो गई चरित्र-शक्ती? रेंग रहें हम फर्श पर बेजुबां, विलुप्त हो गई रीढ़ की हड्डी।

शब्द

शब्द-महत्व शब्दों में निहित प्रभाव होतीं वज़नी, सामर्थ्य कुछ दिखें कुछ दिखे ही नहीं। वाचा से शब्द कभी फल दे जाएं ऐंसे ओस की बूंदें धूप में हो जाएें ओझल जैसे। शब्द कभी रख जांए कुछ ऐसे प्रभाव महान, धूमिल मन से मुक्त सारे सन्ताप कर दे जैसे मलय पवन ले आती ऐसे सुखानुभूती परम वृक्ष बिछाये हों खूबी अपनी पुष्पांचल सम।

अंदाज़

एक अंदाज़ अच्छा ------------------- स्वप्न समुद्र में लगता अच्छा है, बीते बचपन पर खोना। अद्भुत है , मगर लगता अच्छा है । खिल खिलाकर पुष्पवर्षा सम नादानियों पर अपने हंसना, है विचित्र , मगर लगता अच्छा है । वजह बहुतेरे हैं लगने को अच्छे, बहुतेरे ढंग में मिलतें हैं ऐसे कुछ विचित्र और कुछ विशेष जैसे, कोई हंसी जब दिल छू जाये, बेटे-बेटी के चह रे खिल जाये, मातृ वक्ष से शिशू लिपटा हो, अनाथ को कोई गोद मिल जाये, लगता अच्छा है। जितने हैं नभ के तारे, बिखरे हैं अच्छे उतने सारे, लगने को अच्छा तब लगता है, हों प्रस्तुत जब नजर हमारे।

असंगती

असंगती ---------- बदल गयी है जिन्दगी कर्मनिवृत्ति के साथ,    बदल गया है नाता कल से- आसमान वही, धरती वही है फिर भी, रिश्ता बदल गया जीवन के हर पल से। कहीं एक असमंजस चालू है अब भी,    एक सिलसिला चालू है जहन में: छोड़ गया है जो काल के दौड़ के साथ,    पाहुना सा बन आता है मन में। रह रह कर अब भी याद आतीं हैं वो    कार्यकाल के तनावी पल सारे, भुला नहीं पाता हूं उन साथियों को जो    कर्म जीवन में साथ थें मेरे। समय का धनी हो गया हूं मैं आज,     समय अपार भंडार में पड़े ; इस समय के संचय का करूं क्या,     समझ नहीं आ ता मेरे !!

तृषा

इस कमरे में एक रहता है सपना, है यहां आज अर्ध-शताब्दियों से। खोजा है उसे घनघोर कुहेलिका में, मायावी अस्तित्व की प्रतीक्षा जारी है। सपने होते हैं ऐसे ही बडे़ नाछोड़, मिलतें हैं न बिछुड़तें हैं वो कभी। मृग-मरीचिका ही लगतें हों फिर भी, होने में साकार उनके, दौड़ जारी है ।

निवृत्ति

------- जीना है अगर तो मेरी ही तरह जीओ, छोड़ उम्मीदों को असलियत पे आओ। जीया हमने कभी उम्मीदों को सम्हाल, मर मर के पल पल हुृृए हरदम बदहाल। जी रहा हूं बेपरवाह आज मजबूर होकर, लगती है ज़िन्दगी मस्त ऐसे ही जीकर।

Wastnig food

""""""""""""""" Mother,the donor omnipotent, B enefactress to all alive; Gracious reposite of nutriments, L ife's best esse to survive. N ature, the mother-provider Offers nourishment to all, Food has no bequested owner Food for all, nature's goal. Food is not yet all get alike, P lenty take blessed some; some get not a mouthful bite, A canvas  unwelcome. Desired portrait  of food for all, Far cry a dream best ever; Waste not a morsel you need not, Over serving, desired never . Always be saved,food left over Given to  starved  men; Food wastage never ever Wasting a folly inhuman.