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नववर्ष

नववर्ष """"""" वक्त गुजरता गया, रुका ही नहीं। उम्र बढ़ती गई,बढ़ती ही गई। समय की धारा, किसने पाया रोक: निरंतर चलती रही, मैं थकता गया। जिंदगी का जंग थमा नहीं, नहीं थमा। लड़ते रहा मैं, लड़ते रहे और। कहीं जीत हुई किसी की पर मेरी नहीं। हार भी हुई  कभी तो मैं ही हारा। वर्ष आते रहे, जाते रहे बिन बाधाओं के। जाते रहे अपनी गतियों से, थम मैं ही गया। जंग से थक, उम्र से बोझिल, एक अनिश्चयता रह गई वैसी की वैसी: जिंदगी के जंग की शुरूआत में थी जैसी। गुज़र गया एक वर्ष पूरा,हम इंतजार करने लगे; आगत वर्ष की सौगात करने लगे।

মুক্তির স্বপ্ন

********** হারিয়ে যেতে চাই। জগৎ সমুদ্রের তরঙ্গায়িত, অতল গভীর, সদা আন্দোলিত, মহাজলজ অসীম হোক আমার ঠিকানাই। আমার ক্ষুদ্রতায় মুছে যাবে আত্মপরিচয় যেখানে, মহাসমুদ্রের সেই মহাদীর্ঘতায় হয়ে অস্তিত্বহীন ক্ষুদ্রকণার মত, নি:সীম,শৃঙ্খলহীন,পরিচয়হারা অসীম মুক্তিতে হয়ে আনন্দিত ভেসে যাব,দেখেও দেখা যাবেনা, চিনেও চেনা যাবেনা সেখানে।

रीढ़ की हड्डी

कहर सा मचा है मन में, धूमिल सा कुछ उतर रहा; घोर विपत्ती का है संकेत, चक्रवात है कहीं उठ रहा। निशब्द सा है माहौल सारा, अस्थिरता है इस शांति में; अस्फुट एक चीख रह गई, घुटन हो रही मनपवन में। कहीं लुट रहा है अधिकार, बिखर रही कहीं नैतिकता; सभ्यता विहीन समाज में कंगाल रह गई मानवता। किस ज़माने में जी रहें हम, कहा खो गई चरित्र-शक्ती? रेंग रहें हम फर्श पर बेजुबां, विलुप्त हो गई रीढ़ की हड्डी।

शब्द

शब्द-महत्व शब्दों में निहित प्रभाव होतीं वज़नी, सामर्थ्य कुछ दिखें कुछ दिखे ही नहीं। वाचा से शब्द कभी फल दे जाएं ऐंसे ओस की बूंदें धूप में हो जाएें ओझल जैसे। शब्द कभी रख जांए कुछ ऐसे प्रभाव महान, धूमिल मन से मुक्त सारे सन्ताप कर दे जैसे मलय पवन ले आती ऐसे सुखानुभूती परम वृक्ष बिछाये हों खूबी अपनी पुष्पांचल सम।

अंदाज़

एक अंदाज़ अच्छा ------------------- स्वप्न समुद्र में लगता अच्छा है, बीते बचपन पर खोना। अद्भुत है , मगर लगता अच्छा है । खिल खिलाकर पुष्पवर्षा सम नादानियों पर अपने हंसना, है विचित्र , मगर लगता अच्छा है । वजह बहुतेरे हैं लगने को अच्छे, बहुतेरे ढंग में मिलतें हैं ऐसे कुछ विचित्र और कुछ विशेष जैसे, कोई हंसी जब दिल छू जाये, बेटे-बेटी के चह रे खिल जाये, मातृ वक्ष से शिशू लिपटा हो, अनाथ को कोई गोद मिल जाये, लगता अच्छा है। जितने हैं नभ के तारे, बिखरे हैं अच्छे उतने सारे, लगने को अच्छा तब लगता है, हों प्रस्तुत जब नजर हमारे।

असंगती

असंगती ---------- बदल गयी है जिन्दगी कर्मनिवृत्ति के साथ,    बदल गया है नाता कल से- आसमान वही, धरती वही है फिर भी, रिश्ता बदल गया जीवन के हर पल से। कहीं एक असमंजस चालू है अब भी,    एक सिलसिला चालू है जहन में: छोड़ गया है जो काल के दौड़ के साथ,    पाहुना सा बन आता है मन में। रह रह कर अब भी याद आतीं हैं वो    कार्यकाल के तनावी पल सारे, भुला नहीं पाता हूं उन साथियों को जो    कर्म जीवन में साथ थें मेरे। समय का धनी हो गया हूं मैं आज,     समय अपार भंडार में पड़े ; इस समय के संचय का करूं क्या,     समझ नहीं आ ता मेरे !!

तृषा

इस कमरे में एक रहता है सपना, है यहां आज अर्ध-शताब्दियों से। खोजा है उसे घनघोर कुहेलिका में, मायावी अस्तित्व की प्रतीक्षा जारी है। सपने होते हैं ऐसे ही बडे़ नाछोड़, मिलतें हैं न बिछुड़तें हैं वो कभी। मृग-मरीचिका ही लगतें हों फिर भी, होने में साकार उनके, दौड़ जारी है ।