पथ शिशु ---------- पथ में ही वह जन्म लेता: भाग्यहीन दुर्बल मानवता। शैशव देता धूल में लुटाय, तारूण्य लुटता असहाय। यौवन बिकती मूल्यहीन, बुढ़ापा होता अति दीन। जन्म मिलता मानव जैसा मगर क्या लुटने को ऐसा? मिलते नहीं उसे वो सारे, मिलतें हैं हों जब वो हमारे। खोता है वह वो सब सपना पाता है शिशु हमारा अपना। देख पथ शिशुओं की हाल, दो आंसू कभी रो भी लिया; खीं च अपने बाध्य कदमों को, अगले ही पल भुला भी दिया।