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বন্য

মনের দলেই আছি, বন্যদেরই মাঝে, মনের বনে, সারাটা জীবন ধরে- আমাকে শহর দেও। এমন শহর, যেখানে মনহীন জীবন থাকে আর থাকে খোলা আকাশ। আমি দিগন্তিকার পানে চেয়ে থাকব; ক্ষিতিজের রেখায় সূর্য্যকে দিয়ে কাঁধ  বাঁচাব ডুবে যাওয়ার থেকে।

Howrah Bridge

Prodigiously spread across, B ridge over I behold. Counting for times bygone, footfalls young or old. The ages that gone by, Gone raising awed voices, Eyes regarded unbelieving, W heels rolled atop surfaces. How much endurance you have? M outh agape I muse 'n mumble; Y our steel ribs strong and steady, A sphalt so strong,you so humble!!

माँ

वो खोये बचपन के दिन! माँ, तेरा ममत्व भरा स्पर्श, वो आंचल में छिपी सुगंध, माँ कितना होता था हर्ष!! असाधारण थी मातृ छाया, उम्र गुजर गये माँ को खोये, बीते बीसों वियोग-व्यथा के दीर्घ-स्वांस भरे सूने सूने वर्ष। यादें सजीव आज भी वही, आज भी सोच होता है हर्ष।

पथ शिशु

पथ शिशु ---------- पथ में ही वह जन्म लेता: भाग्यहीन दुर्बल मानवता। शैशव देता धूल में लुटाय, तारूण्य लुटता असहाय। यौवन बिकती मूल्यहीन, बुढ़ापा होता अति दीन। जन्म मिलता मानव जैसा मगर क्या लुटने को ऐसा? मिलते नहीं उसे वो सारे, मिलतें हैं हों जब वो हमारे। खोता है वह वो सब सपना पाता है शिशु हमारा अपना। देख पथ शिशुओं की हाल, दो आंसू कभी रो भी लिया; खीं च अपने बाध्य कदमों को, अगले ही पल भुला भी दिया।

नववर्ष

नववर्ष """"""" वक्त गुजरता गया, रुका ही नहीं। उम्र बढ़ती गई,बढ़ती ही गई। समय की धारा, किसने पाया रोक: निरंतर चलती रही, मैं थकता गया। जिंदगी का जंग थमा नहीं, नहीं थमा। लड़ते रहा मैं, लड़ते रहे और। कहीं जीत हुई किसी की पर मेरी नहीं। हार भी हुई  कभी तो मैं ही हारा। वर्ष आते रहे, जाते रहे बिन बाधाओं के। जाते रहे अपनी गतियों से, थम मैं ही गया। जंग से थक, उम्र से बोझिल, एक अनिश्चयता रह गई वैसी की वैसी: जिंदगी के जंग की शुरूआत में थी जैसी। गुज़र गया एक वर्ष पूरा,हम इंतजार करने लगे; आगत वर्ष की सौगात करने लगे।

মুক্তির স্বপ্ন

********** হারিয়ে যেতে চাই। জগৎ সমুদ্রের তরঙ্গায়িত, অতল গভীর, সদা আন্দোলিত, মহাজলজ অসীম হোক আমার ঠিকানাই। আমার ক্ষুদ্রতায় মুছে যাবে আত্মপরিচয় যেখানে, মহাসমুদ্রের সেই মহাদীর্ঘতায় হয়ে অস্তিত্বহীন ক্ষুদ্রকণার মত, নি:সীম,শৃঙ্খলহীন,পরিচয়হারা অসীম মুক্তিতে হয়ে আনন্দিত ভেসে যাব,দেখেও দেখা যাবেনা, চিনেও চেনা যাবেনা সেখানে।

रीढ़ की हड्डी

कहर सा मचा है मन में, धूमिल सा कुछ उतर रहा; घोर विपत्ती का है संकेत, चक्रवात है कहीं उठ रहा। निशब्द सा है माहौल सारा, अस्थिरता है इस शांति में; अस्फुट एक चीख रह गई, घुटन हो रही मनपवन में। कहीं लुट रहा है अधिकार, बिखर रही कहीं नैतिकता; सभ्यता विहीन समाज में कंगाल रह गई मानवता। किस ज़माने में जी रहें हम, कहा खो गई चरित्र-शक्ती? रेंग रहें हम फर्श पर बेजुबां, विलुप्त हो गई रीढ़ की हड्डी।