नववर्ष """"""" वक्त गुजरता गया, रुका ही नहीं। उम्र बढ़ती गई,बढ़ती ही गई। समय की धारा, किसने पाया रोक: निरंतर चलती रही, मैं थकता गया। जिंदगी का जंग थमा नहीं, नहीं थमा। लड़ते रहा मैं, लड़ते रहे और। कहीं जीत हुई किसी की पर मेरी नहीं। हार भी हुई कभी तो मैं ही हारा। वर्ष आते रहे, जाते रहे बिन बाधाओं के। जाते रहे अपनी गतियों से, थम मैं ही गया। जंग से थक, उम्र से बोझिल, एक अनिश्चयता रह गई वैसी की वैसी: जिंदगी के जंग की शुरूआत में थी जैसी। गुज़र गया एक वर्ष पूरा,हम इंतजार करने लगे; आगत वर्ष की सौगात करने लगे।